सत्य की खोज में

Monday, July 19, 2010

पी.सी.एस. टॉपर पुष्पराज सिंह से विशेष मुलाकात

"हारिये न हिम्मत बिसारिये न हरिनाम", जैसी कहावतें शायद पुष्पराज जैसे लोगों के लिए ही बनी है| इस नौकरी के लिए उन्होंने पूरे दस साल जद्दोजहद की | अनेक ऐसे अवसर आये होंगे जब उन्हें घोर निराशा हुई होगी लेकिन पुष्पराज जूझते रहे और अंततः विजयी रहे न केवल विजयी रहे बल्कि स्वर्णिम अक्षरों में अपना नाम लिखाया |  

पुष्पराज सिंह ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यू.पी. पी.एस.सी.) द्वारा आयोजित राज्य की सर्वोच्च सिविल सेवा (पी.सी.एस.) के लिए वर्ष 2007 की परीक्षा (परीक्षा परिणाम घोषित-19 मई 2010) में अखिल प्रदेशीय स्तर पर  प्रथम स्थान प्राप्त किया है |

पुष्पराज सिंह इसीलिए विशिष्ट नहीं हैं कि वह पी.सी.एस. टॉपर हैं, बल्कि इसलिए ज्यादा विशिष्ट हैं कि उन्होंने कई विषम परिस्थितियों को चुनौती देते हुए इतनी बड़ी सफलता हासिल की है | 36 वर्षीय पुष्पराज सिंह नक्सलवादी एवं पिछड़े देहात क्षेत्र के निवासी हैं, उनका शैक्षणिक रिकॉर्ड सेकेण्ड व थर्ड डिवीजन का रहा है, उनकी दस वर्ष पूर्व  शादी हो   गई और वे दो बच्चों के पिता हैं, उन्होंने कालिज की पढाई व सिविल सेवा की तैयारी के दौरान जीवन बीमा निगम की एजेन्सी लेकर घरेलू व निजी आवश्यक खर्चों की पूर्ति की,.......|
                 
पुष्पराज सिंह का मानना है कि यदि व्यक्ति की सोच सकारात्मक है और वह अपने लक्ष्य के प्रति कटिबद्ध है तो हर चुनौती का मुकाबला कर सकता है |

पुष्पराज सिंह से गत दिवस उनके इलाहाबाद स्थित आवास पर लम्बी बातचीत हुई | यहाँ प्रस्तुत है उस बातचीत के प्रमुख अंश -


प्रश्न - आप अपने और अपने परिवार के बारे में कुछ बताइये ?
उत्तर - मेरा नाम पुष्पराज सिंह है | मैं गाँव दुबारकला, जिला मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) का रहने वाला हूँ | मेरे परिवार में मेरे अलावा एक छोटी बहन है, जिसकी शादी हो चुकी है |1 मार्च 2000 को मेरा विवाह श्वेता सिंह से हुआ | मेरे दो बच्चे - श्रेयस्कर राज सिंह (7 वर्ष) एवं यशस्वी राज सिंह (6 वर्ष) है | पिताजी सहायक विकास अधिकारी, पंचायत हैं | पत्नी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएट है और बी.एड. कर रही है | वर्ष 2006 में मेरा चयन डिप्टी एस.पी. पद पर हुआ था और 2007 में डिप्टी कलेक्टर के पद पर हुआ है |


प्रश्न - अपनी शिक्षा के बारे में बताइये ? 
उत्तर - मेरी प्रारम्भिक शिक्षा लालगंज इण्टर कालेज, मिर्जापुर में हुई | वहाँ से हाईस्कूल व इण्टरमीडिएट करने के बाद सन्तरविदास नगर (पूर्व में भदोही) के काशीनरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्द्यालय से बी.ए. व एम.ए. (1998) किया | फिर  सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए इलाहाबाद आ गया |

प्रश्न - आपका एकेडमिक रिकार्ड कैसा रहा ?

उत्तर - मेरा एकेडमिक रिकार्ड बहुत अच्छा नहीं रहा |  हाईस्कूल व इण्टरमीडिएट में सेकण्ड डिवीजन तथा बी.ए. और एम.ए. में थर्ड डिवीजन मिला |

प्रश्न - इसके क्या कारण रहे ?
उत्तर -  इसके पीछे कई कारण थे | मैं मिर्जापुर जिले के एक ऐसे पिछड़े इलाके से हूँ जो कि नक्सल प्रभावी क्षेत्र भी है | पढाई में संसाधनों का अभाव था | जागरूकता नहीं थी | पारिवारिक पृष्ठभूमि में भी कोई ऐसा नहीं था जो कि किसी प्रशासनिक सेवा में रहा हो, इसलिए सही मार्गदर्शन नहीं हो सका | स्कूल, कालेज में भी सही गाइडेंस देने वाला कोई नहीं मिला |  इसके अलावा मुझे उस समय क्रिकेट व कबड्डी का जबरदस्त शौक था | मेरे लिए बस पास होना ही काफी था |


प्रश्न -  सिविल सर्विसेज में आने का रुझान कब और कैसे बना ?   
उत्तर -  बी.ए. प्रथम वर्ष में | गाँव में रहते हुए, अधिकारियों  की हनक, ग्लैमर, पावर देखी थी | गावों में यह सब चीजें अधिक होती हैं | मैं भी इससे बहुत प्रभावित था और मुझे प्रेरणा मिली कि मुझे भी समाज में अपना स्थान अलग बनाना है और फिर बी.ए.प्रथम वर्ष में यह निश्चित किया कि मुझे तैयारी करनी है |
बाद में मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मैंने काफी समय नष्ट कर दिया है - माहौल, जागरूकता, संसाधनों, मार्गदर्शन और दिशानिर्धारण के अभाव में | लेकिन फिर मैंने तय किया कि मैं मेहनत करूंगा, इलाहाबाद आने का निश्चय किया और सब कुछ, सारी तैयारी नये सिरे से शुरू  की  | खुद के अनुभवों से सीखा और खुद में निरन्तर सुधार किया | यही सब कारण रहे जो मुझे यह सफ़र तय करने में 10-12 वर्ष लग गये | 


प्रश्न - पहली बार प्रतियोगी परीक्षा कब दी आपने ? 
उत्तर - वर्ष 1996 में बी.ए. करने के बाद मैंने पहली बार आई.ए.एस.  और पी.सी.एस. दोनों की परीक्षाएं दी | आई.ए.एस. के 4 अटेम्प्टस में दो बार प्रारम्भिक परीक्षाएं उत्तीर्ण  भी कीं लेकिन मुख्य परीक्षाओं में असफलता मिली | उसके बाद से मैं पूरी तरह पी.सी.एस. पर एकाग्र हो गया | विषय भी बदले | पहले हिस्ट्री व फिलास्फ़ी थे, बाद में सोशल वर्क व डिफेन्स स्टडीज पर आया, इण्डियन हिस्ट्री प्री में थी |


प्रश्न -  आपको क्या लगता है कि आप आई.ए.एस. क्यों नहीं निकाल  पाए ? 
उत्तर -  जागरूकता का अभाव | आपको बताऊँ कि मैं आई.ए.एस. की परीक्षा दे रहा था और मुझे धारा 356 का ज्ञान नहीं | अपनी ही ओ.एम.आर. शीट गलती से मैंने ख़राब कर दी | इलाहाबाद में नया था और आते ही, पहला अटेम्प्ट बिना कुछ सोचे समझे दे दिया | जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था | सभी को अपनी उम्र के हिसाब से प्लानिंग करके, तैयारी के साथ आई.ए.एस. की परीक्षा में बैठना  चाहिए क्योंकि इस परीक्षा में सीमित प्रयास ही दिए जा सकते  हैं | तो इस प्रकार से जानकारी के अभाव में मैं गलती कर गया | मेरे दो  प्रयास यूँ ही बेकार चले गये जिनका मुझे आज भी अफ़सोस है और हमेशा रहेगा | चयन होने के लिए एक ही प्रयास बहुत होता है और मेरे तो दो प्रयास यूँ ही बर्बाद हो गये लेकिन क्या किया जा सकता है सब कुछ गवाँ कर होश में आये तो क्या हुआ ....... |


प्रश्न -  आपका चयन वर्ष 2006 में पी.पी.एस. (डिप्टी एस.पी.) में हो गया था तो फिर आप पी.सी.एस. (डिप्टी कलेक्टर) के लिए क्यों प्रयासरत रहे ? 
उत्तर - दरअसल 2006 और 2007 एक ही सेशन का एक्जाम था | दोनों परीक्षाओं में 5 या 6 महीने का अन्तर था | 2006 की परीक्षा  का रिजल्ट नहीं आया था और 07 का मेन्स देना पड़ा था | यदि 2006 का परीक्षा परिणाम  आ गया होता तो शायद मैं 07 की मुख्य परीक्षा न देता |


प्रश्न - क्या आपको इस परीक्षा में टॉप करने की उम्मीद थी ? 
उत्तर - टॉप करने की उम्मीद तो कभी नहीं थी पर अच्छी रैंक पाने की आशा थी | मेरे पेपर अच्छे हुए थे, इस आधार पर चयन का भरोसा था और अच्छी रैंक पाने का भी | हाँ कभी-कभी डर भी लगता था स्केलिंग पद्धति के वैरियेशन से | स्केलिंग में कभी-कभी सौ-सवा सौ अंकों का भी फर्क पड़ जाता है | तो डर सताता था कि स्केलिंग में नुकसान न हो जाए | लेकिन जब भी खुद का मूल्यांकन, एक अलग व्यक्ति बन कर किया तो हमेशा यह भरोसा मिला कि चयन होगा, चयन सुरक्षित है | मेरी नजर में टॉप करने की उम्मीद कोई भी नहीं करता,  सो मैंने भी नहीं की थी |

प्रश्न - क्या आपने इलाहाबाद आकर कोचिंग वगैरहा ज्वाइन की ?
उत्तर - जी नहीं, मैंने व्यक्तिगत सम्बन्धों के आधार पर शिक्षकों इत्यादि का सहयोग लिया
लेकिन लगातार कभी कोचिंग ज्वाइन नहीं की |


प्रश्न - कोचिंग कहाँ तक सहायक होती है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में ? 

उत्तर- कोचिंग से आत्मविश्वास, प्रतियोगी माहौल व शैक्षणिक मार्गदर्शन मिलता है और सबसे बड़ी चीज सही दिशानिर्देशन, सही मार्गदर्शन, सही जानकारी मिलती है कि आपको क्या पढना चाहिए और क्या नहीं, क्या करना चाहिए और क्या नहीं लेकिन सिर्फ कोचिंग पर निर्भर नहीं रहना चाहिए |
अंततः  खुद की पढाई और तैयारी ही काम आती है |


प्रश्न - परीक्षा की तैयारी में किसी पत्रिका या समाचार पत्र का भी कुछ योगदान रहा  ?

उत्तर - जी हाँ, बिलकुल |  क्रोनिकल, प्रतियोगिता दर्पण, घटनाचक्र, इण्डिया टुडे, आउटलुक और दैनिक समाचार पत्रों का तैयारी में बहुत बड़ा योगदान रहा है क्योंकि जो प्रश्न बनते हैं वह राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों से बनते हैं, और इनकी सबसे अच्छी जानकारी का श्रोत ये पत्र-पत्रिकाएं और समाचार पत्र ही हैं | 


प्रश्न -  इतने लम्बे संघर्ष के बाद आपने ऐसी सफलता अर्जित की है तो आगे आने वाले विद्द्यार्थियों को क्या अनुभव देना चाहेंगे ?
उत्तर - मैं यही कहना चाहूँगा कि इस प्रतियोगिता का कोई शार्टकट नहीं है | यह 100 मीटर की रेस नहीं है अपितु मैराथन दौड़ है | सिर्फ 10-15 प्रतिशत प्रतियोगी ही इसमें 2-3 सालों के प्रयास में सफल हो पाते हैं बाकी 90 प्रतिशत को सफलता के लिए इन्तजार करना पड़ता है, उन्हें समय लगता है | पहली चीज धैर्य बनाये रखें | पूरे मनोयोग, तन्यमता से लगे रहें | नकारात्मकता को मन में बिलकुल  स्थान न दें, आलोचनाओं से घबराएँ नहीं | आलोचकों की बातों को भी सकारात्मकता से लें, उससे तैश में न आएं | जिस दिन आपकी आलोचना हो उस दिन 2 घण्टे ज्यादा पढ़ें | अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहें | पढ़ें ज्यादा दिखाएँ कम | ज्यादा से ज्यादा पढ़ें | पढाई को समय में न बाधें कि मैं 10  या 12 घण्टे पढूंगा, इससे दिमाग पर अनावश्यक तनाव बनता है | जिस दिन आप उस समय सीमा को किसी भी कारणवश पूरा नहीं कर पाएंगे, तो तनावग्रस्त होंगे | पढाई का लक्ष्य रखें, समय का नहीं | अपने आप पर विश्वास करें, ईश्वर पर आस्था  रखें, कटिबद्ध रहें, अपने लक्ष्य पर समर्पित रहें | सफलता जरूर मिलेगी | हाँ, स्केलिंग पद्धति का ध्यान रखकर विषयों का चयन करें | यह मेरा सुझाव रहेगा | आर्ट्स के विषयों को स्केलिंग पद्धति में फायदा है | तो इसका ध्यान रखकर विषयों का चयन करें |


प्रश्न - दस वर्ष पूर्व आपकी शादी हो गयी, दो बच्चे हैं | क्या आपकी शादी आपकी तैयारी में कभी बाधक दिखाई दी ?
उत्तर - परिवार, या कोई भी रिश्ता कभी भी, किसी भी उददेश्य में, लक्ष्य प्राप्ति या सफलता में बाधक नहीं होता है | हाँ, समाज और कभी-कभी हम खुद इसे बाधक बना देते हैं, मेरी पत्नी ने हमेशा अपनी जिम्मेदारियों का सफल निर्वाहन किया | सदैव मेरा सहयोग किया | बच्चों के होने के बाद शुरू में दो साल जरूर कुछ दिक्कतें आई लेकिन बाद में मैंने चीजों को व्यवस्थित कर लिया | बच्चों से कह देता था कि मैं बाहर जा रहा हूँ और खुद को आगे के एक कमरे में बन्द कर पढाई करता था | मैं नहीं मानता कि पत्नी, बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं   में बाधक होते हैं |पुष्पराज सिंह अपनी पत्नी व दोनों बच्चों के साथ



 प्रश्न - आपने एल.आई.सी.आफ़ इण्डिया की एजेन्सी भी की, तो यह आपके संघर्ष में बाधक रहा या सहायक रहा ?
उत्तर - मैं वर्ष 1991 से एल.आई.सी.  का एजेन्ट था और यह मेरे लिए सहायक रहा है | इलाहाबाद में हो रहे मेरे सभी खर्चों का 70 प्रतिशत मैं एल.आई.सी. से निकालता था और 30 प्रतिशत के लिए घर पर निर्भर रहता  था | मेरा मानना है कि कम्पटीशन में हर किसी को एक विकल्प बना कर चलना   चाहिए | इससे काफी मदद मिलती है  | इसमें मेरा काफी विकास भी हुआ |


प्रश्न -  तैयारी के साथ साथ आप इस काम को कैसे मैनेज करते थे  जिसकी  प्रकृति  समय  खर्च  करने वाली है ?  
उत्तर - पहले तो जो भी हमारे मित्र चयनित होते थे, मैं उनका बीमा करता था | घर वाले सहयोग करते थे, उनके सम्बन्धों से भी लाभ लिया | विन्ध्याचल मेरी ब्रान्च थी | मैं हफ्ते में दो दिन एल.आई.सी. के लिए समय देता था और बाकी घर वालों के सहयोग से मैनेज कर लेता था |


प्रश्न -  आप किस तरह के एजेन्ट सिद्ध हुए ?  
उत्तर - मैं अच्छा एजेन्ट रहा | मेरा परफारमेंस हमेशा अच्छा रहा | मुझे तीन बार विकास अधिकारी बनने का चांस मिला और इस बार सी.एम .क्लब मेम्बर होने वाला था लेकिन उसी बीच जब थोड़ा ही टारगेट बचा था, मेरे इंटरव्यू का टाइम आ गया, और मैंने उस टारगेट को पूरा नहीं किया | बाकी मुझे 3 बार डी.ओ. के लिए आफ़र किया गया लेकिन अपनी परीक्षाओं की तैयारियों के कारण मैंने उसे अस्वीकार  कर दिया | मैंने तय कर लिया था कि मुझे आई.ए.एस. या पी.सी.एस. ही बनना है |

प्रश्न - आपकी लिखित परीक्षा का अनुभव कैसा रहा ? 

उत्तर - लिखित परीक्षा का अनुभव हर परीक्षा में अलग रहा | मैं लगातार हर साल परीक्षा देता गया और अपने अनुभवों से सीखता गया | हर परीक्षा के बाद मैं खुद का मूल्यांकन कर अपनी गलतियां डायरी में लिखता था और उस पर मेहनत करता | इस तरह से मैंने अपनी कमियां दूर की |

प्रश्न - साक्षात्कार का अनुभव कैसा रहा ?
उत्तर - इन्टरव्यू का अनुभव सकारात्मक रहा | इन्टरव्यू बोर्ड बहुत सहयोग करता है | बहुत रचनात्मक लगता है वहाँ, अच्छा लगता है, अच्छे माहौल में इन्टरव्यू होता है |

प्रश्न - किस तरह के प्रश्न ज्यादा पूछे जाते हैं ?
उत्तर - तरह-तरह के प्रश्न होते हैं | मुख्य परीक्षा के विषय आधारित प्रश्न - स्कूलिंग, एकेडमिक कैरियर, राष्ट्रीय, इन्टरनेशनल रिलेशनशिप, करंट अफेयर्स, राजनीतिक, सामाजिक मुददों पर प्रश्न होते हैं, कुछ व्यक्तिगत प्रश्न - जैसे किस क्षेत्र में आप जाना चाहते हैं, कौन सा पद अच्छा लगता है, कुछ मनोवैज्ञानिक प्रश्न - देश की समस्या, सरकार की प्रगति, उपलब्धियाँ आपके आइडियल पर सवाल, आप को नौकरी क्यों दी जाए, अभी तक सफल क्यों नहीं हुए- यह भी एक प्रश्न होता है |


प्रश्न - सामान्य ज्ञान की तैयारी के लिए आपके क्या सुझाव हैं ?
उत्तर - मेरा सुझाव रहेगा कि सामान्य ज्ञान को सामान्य अध्ययन की तरह न पढ़ें | सामान्य अध्ययन से मेरा तात्पर्य है कि सतही ज्ञान न रखें | इसे भी गम्भीरता और गहराई से पढ़ें | अधिक से अधिक पुस्तकें पढ़ें | जितनी आपकी क्षमता, ऊर्जा हो, जितना साम्राज्य विस्तार कर सकें, जितना भी पढ़ सकें यह अनन्त है | इसका तरीका है कि सामान्य ज्ञान की जो भी चीजें जहाँ से भी मिलती रहें,  उससे खुद को लगातार अपडेट करते रहें, समाचार पत्र, पत्रिका,  इलेक्ट्रानिक मीडिया , प्रिन्ट मीडिया, सेन्ट्रल-स्टेट गर्वनमेंट की पत्रिकाएं, अन्तर्राष्ट्रीय रिपोर्ट, मंत्रालय की रिपोर्ट, पुस्तकें, गाइडें जितना भी मैटेरियल पढ़ सकें, पढ़ें |

प्रश्न - आप प्रतियोगी छात्रों एवं इनके माता पिता को क्या सुझाव देना चाहेंगे ?

उत्तर - मैं अभिभावकों से अपील करूंगा कि वे धैर्य बनाए रखें और अपने बच्चों पर विश्वास करें |
प्रतियोगियों को मैं यह कहूँगा कि वे अपनी जिम्मेदारियों को समझें और पूरी ईमानदारी व लगन से अपने दायित्वों का निर्वाहन करें |


प्रश्न - सफलता-असफलता के दौर में आने वाली फ्रस्टेशन से उबरने का आपका क्या तरीका था ?

उत्तर - मैं स्वंय का मूल्यांकन करता था, मेहनत करता था, मित्रों-परिवार से बात करता था
मैंने सकारात्मकता का साथ कभी नहीं छोड़ा | सकारात्मकता से ही इन चीजों पर विजय पाई जा सकती है | मैंने कभी हार नहीं मानी मेहनत और इच्छाशक्ति के आधार पर ऊर्जा और क्षमता को विकसित किया जा सकता है | दुनिया में कोई भी चीज असंभव नहीं है |

प्रश्न - थोड़ी देर पहले आपने कहा था कि मेहनत करें और ईश्वर में आस्था रखें | ईश्वर में आस्था रखने से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर -  देखिये, ईश्वर को किसी ने भी देखा नहीं है | लेकिन यह सभी मानते हैं और मैं भी मानता हूँ कि एक अदृश्य सत्ता है जो इस विश्व को संचालित कर रही है और इसका सीधा उदाहरण है कि किसी भी परिस्थिति में सुख में, दुःख में, कष्ट में, ईश्वर का नाम लेने के बाद सुकून महसूस होता है, शान्ति मिलती है | शान्ति भौतिकता में नहीं है,  आध्यात्मिकता में है | मन्त्रों में, गायत्री मंत्र में, हनुमान चालीसा में बहुत शक्ति है लेकिन परीक्षा में मंत्र लिखने से अंक नहीं मिलेंगे | एक लाइन में कहूं तो कर्म और भाग्य के संयोग से सफलता मिलती है |


प्रश्न - भाग्य से आपका क्या तात्पर्य है ?
उत्तर - भाग्य प्रारब्ध है | पूर्व में आपके द्वारा किये गये कर्मों का फल है | भाग्य कर्म से बनता है | उदाहरण के लिए 'नेपोलियन' ने जब अपना हाथ ज्योतिषी को दिखाया तो ज्योतिषी ने कहा कि तुम कुछ नहीं कर पाओगे क्योंकि तुम्हारे हाथ में तो भाग्य रेखा है ही नहीं | उसी समय नेपोलियन ने चाकू से अपने हाथ में लकीर बनाकर कहा कि मैं विश्व विजेता बनूँगा और अपनी लगन, मेहनत व महत्वाकांक्षा  से बनकर दिखाया | इस प्रकार अपने कर्म से नेपोलियन ने अपने भाग्य में विश्वविजेता बनना लिख दिया | "वीर  भोग्या वसुन्धरा" कहा गया है | भोग वीरों के ही भाग्य में है और वीर वही होता है जो कर्मवादी होता है, कर्म करता है | जो आप आज करते हैं वही कल आपका भाग्य बनता है | भाग्य भी आवश्यक है लेकिन कर्म प्रबल है |


प्रश्न -  आपको किन चीजों का शौक रहा है ?
उत्तर -  क्रिकेट, कबड्डी खेलना, पुराने गाने सुनना, खाली समय में मित्रों का साथ, पुस्तकें पढना आदि | मैंने  किरण बेदी और ए.पी.जे.अब्दुल कलाम जी की कई पुस्तकें पढ़ीं | अटल बिहारी बाजपेयी जी की कवितायेँ भी पढ़ी हैं | इनकी कविता "हार नहीं मानेंगे, रार नहीं ठानेंगे, काल के कपाल पर......" ने बहुत प्रभावित किया है |


प्रश्न -  आपकी नजर में उत्तर प्रदेश की मुख्य  समस्या क्या है ?
उत्तर -  हमारे प्रदेश में बहुत सारी समस्याएं हैं | अशिक्षा मुख्य समस्या है और यही अन्य समस्याओं की जड़ है | अशिक्षा से ही गरीबी, बेरोजगारी, जागरूकता की कमी, जनसंख्या वृद्धि आदि समस्यायें उत्पन्न होती है | शिक्षित व्यक्ति समस्याओं का हल ढूंढने का प्रयास करता है और अशिक्षित सिर्फ समस्याओं को जन्म देता है |


प्रश्न - नौकरी में आपकी प्राथमिकताएं क्या होंगी ? 
उत्तर - जनता के बीच में रहकर, उनके लिए काम करना | सरकार की योजनाओं, परियोजनाओं का समय से क्रियान्वयन | समस्याओं को पूरी संवेदनशीलता से समझ कर त्वरित कार्यवाही व निर्णय का प्रयास करूंगा |


प्रश्न - आज के इस समय में जब चारों तरफ लूट खसोट का माहौल हँ तो ऐसे में आप खुद को ब्यूरोक्रेट्स, क्रिमिनल्स एवं भ्रष्ट राजनेताओं तथा इस भ्रष्ट माहौल से कैसे बचायेंगे ?
उत्तर - मैं स्वंय की गारण्टी लेता हूँ | साफ सुथरी नौकरी करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ | मैंने इस माहौल को बहुत नजदीक से देखा, समझा और सहा है | मैं वही कार्य करूंगा जो मेरे अधिकार क्षेत्र में होगा | और यदि कोई उच्चाधिकारी मुझसे कुछ भी अनैतिक  या असंवैधानिक करने को कहेगा तो मैं उससे वह कार्य लिखित में देने को कहूँगा | कोई भी मौखिक आदेश नहीं स्वीकारूंगा, फिर इसके लिए आगे चाहे जो हो, स्थानान्तरण या जो भी, मैं तैयार हूँ | अपने स्तर पर सभी दायित्वों का पूरी ईमानदारी  के साथ निर्वाहन करूंगा |

प्रश्न - ईमानदारी के प्रति आपका इतना लगाव क्यों है ? 
उत्तर - क्योंकि जरूरत ही नहीं है बेईमानी की | मैं इच्छाओं को असीमित बनाने में विश्वास नहीं रखता | इच्छाओं पर नियंत्रण होना चाहिए और मूलभूत आवश्यकताओं  की पूर्ति सरकार कर रही है | अच्छा वेतन, गाड़ी, आवास, सर्वेन्ट्स, मान-सम्मान सब कुछ यह नौकरी देती है | दो बच्चे हैं, वे अच्छे से पढ़ लिख जाएँ, इससे ज्यादा की अभिलाषा नहीं | मैं कुख्यात नहीं, विख्यात होना चाहूँगा |

प्रश्न - कभी राजनीति में आने की इच्छा हुई या नहीं ? 
उत्तर - जनता की सेवा करने के कई माध्यम हैं और इन सबमें मुझे अपने लिए प्रशासनिक सेवा का माध्यम ही सबसे अच्छा लगता है | राजनीति में जाने की न कभी महत्वाकांक्षा रही, न इच्छा |

प्रश्न - आपके जीवन का लक्ष्य क्या है ?
उत्तर - अपने पद और दायित्वों का सही रूप से निर्वाह कर सकूं | अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकूं, वे किसी लायक बन जाएं | परिवार व समाज की सेवा करूँ, जनता की भलाई में कुछ मेरा भी योगदान रहे |

प्रश्न - आप किसको अपना रोल माडल मानते हैं ?
उत्तर - मेरे पिताजी | वे बहुत सरल हैं | उन्होंने सदैव मुझे नैतिकता की शिक्षा दी, मुझे प्रोत्साहन दिया, अपनी सामर्थ्य भर मुझे पूरा सहयोग दिया | लोगों की सहायता करते हैं, सभी की समस्याएं सुनते और सुलझाते हैं |


                                          संक्षिप्त परिचय
                  
        नाम                                  पुष्पराज सिंह
        जन्मदिन                           10-02-1973
        शिक्षा                                 एम. ए. (1998)
        जन्म स्थान -                    गाँव  दुबार कलां, जिला -मिर्जापुर (उ.प्र.)
        पिता                                  श्री राम जी सिंह (ए.डी.ओ. पंचायत)
        माता                                  (स्व.) श्रीमती  फुलवंती देवी
        पत्नी                                 श्रीमती श्वेता सिंह (एम.ए.)
        बच्चे                                 श्रेयस्कर राज सिंह (7 वर्ष) एवं यशस्वी राज सिंह (6 वर्ष)
        शादी                                 1 मार्च, 2000

                                        *******************************

6 comments:

  1. आभार इस बातचीत का.

    ReplyDelete
  2. पुष्पराज सिंह जी से मिलवाने का आभार !!

    ReplyDelete
  3. लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

    नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
    चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है.
    मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
    चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है.
    आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

    डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
    जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है.
    मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
    बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में.
    मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

    असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
    क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो.
    जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
    संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम.
    कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

    ReplyDelete
  4. इलाहाबाद में पूर्वी उत्तर प्रदेश के दूरस्थ ग्रामीण अंचल से आने वाले छात्र अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भेंट कर देते हैं। जिन्हें सफलता मिल जाती है उन्हें तो दुनिया सलाम करती है लेकिन जो असफल होकर ३५-४० की उम्र में घर लौटते हैं उनका जीवन नारकीय हो जाता है। उनसे साधारण श्रम आधारित कार्य भी नहीं हो पाता और दूसरी छोटी नौकरियाँ भी हाथ से निकल जाती है।

    प्रशासनिक पदों पर चयन के लिए उम्र की जो अधिकतम सीमा निर्धारित सीमा है उससे पुष्पराज जैसे इक्का-दुक्का लोगों को तो लाभ हो जाता है लेकिन एक बहुत बड़ी संख्या इस दौड़ में आखिरी समय तक शामिल होने के बाद अपना जीवन घनघोर कष्ट में बिताने के लिए अभिशप्त हो जाती हैं। आजकल पीसीएस में चयन के लिए कड़ी मेहनत और अच्छी प्रतिभा के साथ-साथ अच्छे भाग्य की जरूरत भी पड़ रही है।

    ReplyDelete
  5. नमन करता हूं आपके साहस को

    ReplyDelete